माघ पूर्णिमा का महत्व और पौराणिक कथा

माघ मास की पूर्णिमा पर नदी तट का सुंदर फोटो

Magh Purnima Puja: हिंदू धर्म में माघ मास की पूर्णिमा को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस महीने के प्रत्येक दिन को उत्सव के समान माना जाता है। 'माघ' शब्द का संबंध 'मघा' नक्षत्र से है, क्योंकि इस महीने की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा मघा नक्षत्र के समीप होता है। चूंकि वर्ष 2026 में माघ मास का प्रारंभ 4 जनवरी से हो चुका है, जिसका समापन माघ पूर्णिमा के दिन, 1 फरवरी, रविवार को होगा।ALSO READ: माघ मेले में जा रहे हैं तो करें पांच तरह का दान, सभी संकट हो जाएंगे दूर

 

  1. माघ माह का महत्व
  2. नदी स्नान का पुण्य
  3. सूर्य और नारायण की कृपा
  4. तिल का प्रयोग
  5. कल्पवास
  6. माघ मास की कथा
  7. पूर्णिमा की कथा

 

माघ माह का महत्व

शास्त्रों में कहा गया है कि माघ मास में किए गए स्नान और दान से जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाते हैं। माघ मास में विशेष रूप से गंगा नदी या किसी पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इसका महत्व निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है:

 

नदी स्नान का पुण्य

ऐसी मान्यता है कि माघ के महीने में सभी देवी-देवता पृथ्वी पर आते हैं और प्रयागराज के संगम में निवास करते हैं। जो व्यक्ति इस माह में गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है।ALSO READ: माघ मेला 2026: स्नान की तिथियां और कल्पवास का महत्व जानें

 

सूर्य और नारायण की कृपा

इस महीने में सूर्य देव और भगवान विष्णु (माधव) की पूजा का विधान है। सूर्य के उत्तरायण होने के कारण यह समय ऊर्जा और चेतना जागृत करने वाला होता है।

 

तिल का प्रयोग

माघ में तिल का छह रूपों में उपयोग (स्नान, उबटन, तर्पण, आहुति, भोजन और दान) पापों का नाश करता है। इन दिनों मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का त्याग अनिवार्य है। सिर्फ सात्विक भोजन ही मान्य हैं। इन दिनों किसी भी जरूरतमंदों को गुड़, तिल या ऊनी वस्त्र दान देना चाहिए।

 

कल्पवास

प्रयागराज में श्रद्धालु पूरे महीने नदी के किनारे कुटिया बनाकर रहते हैं, जिसे 'कल्पवास' कहा जाता है। यह संयम और साधना का प्रतीक है। कल्पवासी इस दौरान भूमि शयन यानी जमीन पर सोते हैं।

 

माघ मास की कथा

 

स्कंदपुराण के रेवाखंड में माघ माह से जुड़ी एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा वर्णित है, यह कथा ब्राह्मण शुभव्रत के कल्याण प्राप्ति की है। माघ स्नान की कथा में उल्लेख में आया है कि प्राचीन काल में नर्मदा तट पर शुभव्रत नामक ब्राह्मण निवास करते थे। वे सभी वेद शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता थे। किंतु उनका स्वभाव धन संग्रह करने का अधिक था। उन्होंने धन तो बहुत एकत्रित किया। 

 

वृद्धावस्था के दौरान उन्हें अनेक रोगों ने घेर लिया। तब उन्हें ज्ञान हुआ कि मैंने पूरा जीवन धन कमाने में लगा दिया अब परलोक सुधारना चाहिए। वह परलोक सुधारने के लिए चिंतातुर हो गए। अचानक उन्हें एक श्लोक याद आया जिसमें माघ मास के स्नान की विशेषता बताई गई थी। 

 

उन्होंने माघ स्नान का संकल्प लिया और 'माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।' इसी श्लोक के आधार पर नर्मदा में स्नान करने लगे। नौ दिनों तक प्रात: नर्मदा में जल स्नान किया और 10वें दिन स्नान के बाद उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। शुभव्रत ने जीवन भर कोई अच्छा कार्य नहीं किया था लेकिन माघ मास में स्नान करके पश्चाताप करने से उनका मन निर्मल हो गया। 

 

माघ मास के स्नान करने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई यानी स्वर्ग लोक में स्थान मिला। इस तरह जीवन के अंतिम क्षणों में उनका कल्याण हो गया और उनका परलोक सुधार गया। अत: माघ माह के दौरान स्नान, दान, और भक्ति से जुड़ा यह विशेष समय मनुष्य को आत्मिक शांति, मोक्ष और स्वर्ग दिलाने में लाभकारी है।

 

यह कथा यह संदेश देती है कि चाहे मनुष्य ने जीवन भर कोई पुण्य न किया हो, यदि वह माघ मास में सच्चे मन से स्नान और भगवान की भक्ति करता है, तो उसे सद्गति प्राप्त होती है।


पूर्णिमा की कथा

 

पूर्णिमा व्रत की एक कथा के अनुसार कांतिका नगर में धनेश्वर नाम के ब्राह्मण अपना जीवन भिक्षा मांगकर अपना जीवन निर्वाह था। उसकी कोई संतान नहीं थी। एक दिन उसकी पत्नी नगर में भिक्षा मांगने गई, परंतु सभी ने उसे बांझ कहकर भिक्षा देने से इनकार कर दिया। फिर किसी ने ब्राह्मण दंपत्ति को 16 दिन तक मां काली की पूजा करने को कहा।

 

उन्होंने विधिवत पूजा करके आराधना की और तब उनकी आराधना से प्रसन्न होकर मां काली ने दोनों को संतान प्राप्ति का वरदान दिया और कहा कि अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम दीपक जलाओ। इस तरह हर पूर्णिमा के दिन तक दीपक बढ़ाते जाना है जब तक कम से कम 32 दीपक न हो जाएं। इसके बाद ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को पूजा के लिए पेड़ से आम का कच्चा फल तोड़कर दिया और उसकी पत्नी ने पूजा की और फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई। 

 

उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम देवदास रखा। देवदास जब बड़ा हुआ तो उसे अपने मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा। काशी में धोखे से देवदास का विवाह हो गया। देवदास ने कहा कि वह अल्पायु है परंतु फिर भी जबरन उसका विवाह करवा दिया गया। कुछ समय बाद काल उसके प्राण लेने आया लेकिन ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्णिमा का व्रत रखा था, इसलिए काल उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया। कहा जाता है कि तभी से पूर्णिमा का व्रत करने से समस्त संकटों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
 

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: माघ पूर्णिमा: व्रत, विधि, महत्व और अचूक उपाय

 



from ज्योतिष https://ift.tt/QbJw5dE
Previous
Next Post »