Narmada Jayanti 2026: 25 जनवरी को मनेगा मां नर्मदा का प्राकट्योत्सव, जानें कलियुग में कैसे करें मां नर्मदा की भक्ति

मां नर्मदा देवी के साथ नदी का चित्र

Maa Narmada Jayanti : हमारे पञ्च महाभूतों में जल का महत्वपूर्ण स्थान है और यदि वह जल 'नर्मदा जल' हो तब उसकी महत्ता असीम व अनिर्वचनीय हो जाती है। कलियुग में मां नर्मदा ही एकमात्र ऐसी पवित्र नदी हैं जिनके दर्शन मात्र से पातकी-महापातकी भी अपने जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं। मां नर्मदा के प्राकट्य का विस्तृत वर्णन हमें स्कन्द पुराण के रेवा खण्ड में मिलता है।ALSO READ: नर्मदा परिक्रमा का क्या है महत्व, कितने दिन चलना पड़ता है पैदल

 

शास्त्रानुसार मां नर्मदा का प्राकट्य माघ शुक्ल सप्तमी दिन, रविवार को मकर राशि गत सूर्य में अश्विनी नक्षत्र में हुआ था। मां नर्मदा के प्राकट्य को लेकर हमें पुराणों और शास्त्रों में अनेक वर्णन मिलते हैं, कहीं कहीं मां नर्मदा को भगवान शिव के सोमकला के निसृत एक बिन्दु कण के कन्यारूप में परिणत होने की कथा आती है तो कहीं मां नर्मदा को भगवान शिव के स्वेद से उत्पन्न बताया जाता है लेकिन एक बात जो निर्विवाद रूप से सत्य है; वह है कि मां नर्मदा का प्राकट्य भगवान शिव के विग्रह के माध्यम से हुआ है, इसलिए वे शिव की पुत्री के रूप में जगप्रसिद्ध हुईं। 

 

मेकल पर्वत के धारण करने के कारण मां नर्मदा का एक नाम मेकलसुता भी है। भगवान शिव द्वारा अमरता का प्रथम वरदान प्राप्त होने के कारण इनका सुप्रसिद्ध नाम 'न-मृता' (कभी न मरने वाली) अर्थात् 'नर्मदा' हुआ। मां नर्मदा विश्व की एक मात्र ऐसी पवित्र नदी हैं जिनकी परिक्रमा की जाती है। यह परिक्रमा लगभग 3100 किमी की होती है। मां नर्मदा सदैव पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। 

 

मां नर्मदा को वरदान देते हुए भगवान विष्णु ने कहा है-

'नर्मदे त्वं महाभागा सर्वपापहरी भव।

त्वदप्सु या: शिला: सर्वा: शिवकल्पा भवन्तु ता:॥'

 

- अर्थात् हे नर्मदे! तुम बड़ी भाग्यवान हो। तुम इस संसार के समस्त प्राणियों के पाप-ताप को हरण करने वाली रहोगी। तुम्हारे जल में स्थित सब पाषाण (पत्थर) शिवतुल्य होंगे। उनकी पूजा 'नर्मदेश्वर' अर्थात् साक्षात् शिव के रूप में होगी। 

 

मां नर्मदा के अनेक नाम हैं जिनमें भगवान शिव की जटाओं में वास के कारण उन्हें 'जटाशंकरी', सोमकला से उत्पन्न होने के कारण 'सोमोद्भवा', मेकल पर्वत द्वारा धारण किए जाने के कारण 'मेकलसुता', अत्यन्त वेगवती होने के कारण 'रेवा' और अमरता का वरदान प्राप्त होने के कारण 'नर्मदा' (न-मृता) प्रसिद्ध हैं। मां नर्मदा को दक्षिण गंगा भी कहा जाता है क्योंकि यह भारतवर्ष के दक्षिण भाग में स्थित हैं। 

 

स्कंद पुराण अनुसार सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का जल एक सप्ताह में, गंगा का जल स्नान करते ही जीव को पवित्र कर देता है किन्तु मां नर्मदा का तो दर्शन मात्र ही जीव के जन्म-जन्मांतर के पापों को क्षय अर्थात् नष्ट कर देता है। शास्त्रानुसार मां नर्मदा सर्वत्र पूज्यनीया मानी गई हैं। नर्मदा पुराण के अनुसार मां नर्मदा के तट पर जो एक रात्रि भी व्यतीत कर लेता है वह अपनी सौ पीढ़ियों को तृप्ति व मुक्ति प्रदान कर देता है। मां नर्मदा के संगम पर स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।

 

कलियुग में कैसे करें मां नर्मदा की भक्ति-

 

श्रीमद्भभागवत के अनुसार कलियुग में धर्म अपने केवल एक पैसे से स्थित है। शास्त्रानुसार कलियुग में केवल नाम जप व दान से ही अनन्त पुण्यफल की प्राप्ति कही गई है। यह बात सत्य है कि तीर्थ व पवित्र नदियों के तटों पर स्नान, दान, जप, होम आदि करने का कई गुना अधिक पुण्यफल प्राप्त होता है किन्तु यह बात भी उतनी ही सत्य है कि तीर्थ व पवित्र नदियों के तटों पर जो पापकर्मों का संचयन किया जाता है उसका दोष भी अनन्त गुना होता है। 

 

मां नर्मदा की भक्ति पूजा तो शास्त्रानुसार पंचोपचार, दशोपचार, षोडशोपचार विधि से करना ही चाहिए किन्तु आज वर्तमान में मां नर्मदा की भक्ति की सर्वाधिक आवश्यकता है वह है मां नर्मदा को प्रदूषित ना करना। आज चहुंओर मां नर्मदा के तटों पर गंदगी का अंबार सा लगा दिखाई देता है। कई गंदे नाले व प्रदूषित जल का निकास मां नर्मदा के जल में किया जाता है।

तथाकथित श्रद्धालुगण भी मां नर्मदा में स्नान करते समय साबुन, शैम्पू आदि का बेतहाशा उपयोग करते हैं। कुछ लोग तो अपने वस्त्र एवं अन्य दूषित सामग्री भी मां नर्मदा में प्रक्षालित करते दिखाई देते हैं वहीं कुछ अपने घरों की अनुपयोगी पूजा सामग्री मां नर्मदा में विसर्जित कर देते हैं, इन सब से मां नर्मदा का धवल आंचल मैला और प्रदूषित होता है। 

 

कुछ अल्पज्ञानी महानुभाव अपने इस कुतर्क से कि बच्चों द्वारा मां की गोद को अस्वच्छ करने में कोई हानि और हम सब मां नर्मदा के बच्चे हैं, नर्मदा प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। मैं उन तथाकथित विद्वानों से पूछना चाहता हूं कि आखिर किस आयु तक वो स्वयं को बच्चा समझकर इस प्रकार का प्रदूषण फैलाते रहेंगे?

मेरे देखे आज का युग प्रदर्शन का युग है, लोग धार्मिक दिखने में अधिक उत्सुक दिखाई देते हैं बनिस्बत धार्मिक होने के, धार्मिक होना बड़ी दुष्कर बात है। उसमें बड़ा साहस चाहिए। 

 

यदि आप सच में नर्मदा जयंती के इस पावन अवसर मां नर्मदा का पूजन अर्चन कर उनकी भक्ति करना चाहते हैं तो आज यह संकल्प लीजिए कि हम मां नर्मदा को प्रदूषित नहीं करेंगे। हम उन्हें केवल एक नदी की तरह नहीं वरन अपनी जन्मदात्री की मां के सदृश ही मानेंगे फिर देखिए मां नर्मदा कैसे आपकी झोली वरदानों से भर देती हैं शास्त्र का वचन है-

 

'यं यं वांछ्यति कामं, तं तं प्राप्नोति वै सर्वं नर्मदाया: प्रसादत:॥'

 

- जो भी श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा, निश्छल व निर्मल प्रेम से मां नर्मदा से जो भी याचना करता है मां उसे तत्क्षण पूर्ण कर देती हैं।

 

तो आइए इसी पावन संकल्प के साथ कि हम अपनी मां नर्मदा को प्रदूषित नहीं करेंगे, अपने इसी निश्छल-निर्मल मनोभाव रूपी पुष्प को मां नर्मदा के पवित्र पावन चरणों में अर्पित करें और उनसे याचना करें वे हम सब पर अपने आशीर्वाद बनाए रखें।

 

नर्मदे हर!

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


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