
1. खरमास: जब धीमी होती है सूर्य की चाल
खरमास:खरमास साल में दो बार आता है। ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य देव धनु और मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस समय को 'खरमास' कहा जाता है।
कब-कब: पहला दिसंबर-जनवरी (धनु संक्रांति) में और दूसरा मार्च-अप्रैल (मीन संक्रांति) में।
कारण: माना जाता है कि इन राशियों में सूर्य का प्रभाव कमजोर या 'मलिन' हो जाता है। चूंकि सूर्य ऊर्जा और सौभाग्य के कारक हैं, इसलिए उनके कमजोर होने पर विवाह, गृह-प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित हो जाते हैं।
पौराणिक कथा: कथा है कि सूर्य देव के घोड़े थक गए थे, तब उन्होंने गधों (खर) को रथ में जोता, जिससे रथ की गति धीमी हो गई। इसी 'धीमी गति' के कारण इसे खरमास कहते हैं।
2. अधिक मास: जब बिगड़ता है कैलेंडर का तालमेल
मलमास शब्द का उपयोग खरमास के लिए भी करते हैं और अधिकमास के लिए भी। अधिक मास साल में दो बार नहीं, बल्कि लगभग हर 3 साल (32 माह, 16 दिन) में एक बार आता है। इसे 'पुरुषोत्तम मास' भी कहते हैं।
वैज्ञानिक कारण: सौर वर्ष (365 दिन) और चंद्र वर्ष (354 दिन) के बीच हर साल 10 से 11 दिनों का अंतर आता है। तीन साल में यह अंतर लगभग 1 महीने (33 दिन) का हो जाता है। इस अंतर को पाटकर दोनों कैलेंडरों में तालमेल बिठाने के लिए एक 'अतिरिक्त महीना' जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहते हैं।
विशेषता: इसमें कोई संक्रांति (सूर्य का राशि परिवर्तन) नहीं होती, इसलिए इसे 'मलिन' या शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया था। बाद में भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम 'पुरुषोत्तम' दिया, जिससे यह भक्ति और दान के लिए सर्वश्रेष्ठ महीना बन गया।
खरमास सूर्य की स्थिति पर आधारित है (इसलिए साल में दो बार आता है), जबकि मलमास को चंद्र कैलेंडर के समय की गणना को शुद्ध करने के लिए आता है।
from ज्योतिष https://ift.tt/vTQek74
EmoticonEmoticon