
रामजन्म, राज्याभिषेक और वनवास:
ऐसे ही उलझन हमें प्रभु श्रीराम के जीवन और ज्योतिष के सन्दर्भ में यदा-कदा सुनने को मिलती है, जिसके आधार पर कुछ अल्पज्ञ ज्योतिष की प्रामाणिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। ज्योतिष के विरूद्ध उनके इस भ्रामक प्रचार का आधार प्रभु श्रीराम के जीवनलीला के तीन महत्त्वपूर्ण प्रसंग होते हैं जिनके आधार पर वे ज्योतिष शास्त्र की निन्दा करते हैं, ये मुख्य तीन प्रसंग है- रामजन्म, राज्याभिषेक और वनवास।
आपने ऐसा अक्सर सुना होगा कि रामजन्म और राज्याभिषेक का मुहूर्त्त श्रेष्ठ विद्वानों द्वारा निकाले जाने के उपरान्त भी प्रभु श्रीराम के जीवन में इतने कष्ट क्यों आए? आज रामनवमी के इस पुनीत-पावन अवसर पर हम श्रीराम की लीला के इन्हीं प्रसंगों व ज्योतिष के सन्दर्भ कुछ तथ्यात्मक विश्लेषण करेंगे जिससे निष्कर्षत: हमारे सुधि पाठकगण पाएंगे कि श्रीराम के जीवन में आए कष्टों में ज्योतिषीय गणना या ज्योतिष के गलत साबित होने जैसी कोई बात है ही नहीं। इसी क्रम में आईए हम पहले प्रसंग का विश्लेषण करते हैं-
1. रामजन्म-
भ्रान्ति:- इस प्रसंग के सन्दर्भ में रामचरित मानस की एक पंक्ति को आधार बनाकर ज्योतिष को गलत साबित करने का कुत्सित प्रयास किया जाता है, जो इस प्रकार है-
"जोग,लगन,ग्रह,वार,तिथि, सकल भये अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत, राम जनम सुख मूल॥"
कुछ तथाकथित विद्वान इसकी गलत व्याख्या करते हुए कहते हैं कि जब समस्त योग, ग्रह, वार, तिथि अनुकूल थे तो श्रीराम के जीवन में कष्ट क्यों आए?
तथ्यात्मक समाधान:- यहां ध्यान देने योग्य मुख्य बात यह है कि इस दोहे में ग्रह-योग की यह समस्त अनुकूलता प्रभु श्रीराम के परिप्रेक्ष्य में नहीं कही गई है, वह अनुकूलता तो समस्त जड़ और चेतन के सन्दर्भ में कही गई है क्योंकि अगली पंक्ति में यह स्पष्ट है कि जब राम का जन्म होता है तो समस्त जड़ और चेतन के लिए सभी कुछ अनुकूल हो जाता क्योंकि राम का जन्म सुख का मूल है। इसमें कहीं भी ग्रहों की अनुकूलता प्रभु श्रीराम के जीवन के सन्दर्भ में नहीं कही गई है। अत: यहां ज्योतिष के गलत सिद्ध होने का प्रश्न ही नहीं है।
2. राज्याभिषेक-
भ्रान्ति:- अब दूसरी भ्रान्ति के बारे में विश्लेषण करते हैं जो प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक सम्बन्ध में है कि जब वशिष्ठ जी जैसे विद्वान गुरू ने श्रीराम के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला था तब उन्हें राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास क्यों भोगना पड़ा?
तथ्यात्मक समाधान:- यह बात सर्वथा असत्य है कि वशिष्ठ जी ने श्रीराम के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला था। मानस की इस पंक्ति को ध्यानपूर्वक पढ़ें-
"यह विचार उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥"
अर्थात् राजा दशरथ जी ने अपने मन में श्रीराम के राज्याभिषेक का विचारकर शुभ दिन और उचित समय पाकर यह वशिष्ठ जी को जाकर यह सुनाया। यहां शुभदिन और सुअवसर का उल्लेख वशिष्ठ जी के पास जाने के समय के परिप्रेक्ष्य में है ना कि श्रीराम के राज्याभिषेक सन्दर्भ में, जब राजा दशरथ वशिष्ठ जी से मिलने पहुंचे तब गुरू वशिष्ठ जी ने उनसे कहा-
"अब अभिलाषु एकु मन मोरें, पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें।
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू, कहेउ नरेश रजायसु देहू॥"
अर्थात् राजा का सहज प्रेम देखकर वशिष्ठ जी ने उनसे राजाज्ञा (रजायसु) देने को कहा। यहां विशेष बात यह है कि गुरू अनहोनी का सिर्फ़ संकेत मात्र ही कर सकता है राजाज्ञा का उल्लंघन नहीं। जिस प्रकार महाभारत में गुरू द्रोण और कृपाचार्य ने ना चाहते हुए भी राजाज्ञा का पालन करते हुए कौरवों के पक्ष में पाण्डवों के विरूद्ध युद्ध किया जबकि वे ह्रदय से पाण्डवों के पक्ष में थे। यहां वशिष्ठ जी ने भी अनहोनी का केवल संकेत मात्र ही किया था जो मानस की इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है-
"बेगि बिलम्बु करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥"
यहां वशिष्ठ जी कह रहे हैं कि राजन् शुभदिन तभी है जब राम युवराज हो जाएं, वशिष्ठ जी ने यह नहीं कहा कि राम ही युवराज होंगे। यहां भी ज्योतिषीय भविष्यवाणी के असत्य होने जैसी कोई बात नहीं है। आगे एक और संकेत मिलता है जिसमें कहा गया है-
"जौं पाँचहि मत लागै नीका।
करहु हरषि हियैं रामहि टीका॥"
अर्थात् यदि पंचों को (आप सब को) यह मत अच्छा लग रहा है तो राम का राजतिलक कीजिए। इससे स्पष्ट है कि गुरू वशिष्ठ जी ने राजाज्ञा और जनभावना का आदर करते हुए प्रभु श्रीराम के राजतिलक की सहमति प्रदान की थी, उनकी जनमपत्रिका और मुहूर्त्त देखकर नहीं।
3. वनवास-
अब एक प्रसंग जो ज्योतिष को प्रामाणिक सिद्ध करता है उसका उल्लेख हमें मानस की इन पंक्तियों में प्राप्त होता है जब मंथरा माता कैकयी से कहती है-
"पूँछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची।
भरत भुआल होहिं यह साँची॥"
अर्थात् मैंने ज्योतिषियों से पूछा है तो उन्होंने रेखा खींचकर (गणना करके) कहा है कि भरत राजा होंगे। यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि महात्मा भरत ने भले ही राजतिलक कराना स्वीकार नहीं किया किन्तु 14 वर्षों तक श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में एक राजा के सदृश ही राज्य का संचालन किया था।
उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि मानस की इन पंक्तियों को आधार बनाकर वेदांग ज्योतिष पर प्रश्नचिन्ह लगाकर उसे मिथ्या साबित करना सर्वथा अनुचित है।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com
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