Ganga Snan 2026: गंगा स्नान, पूजा विधि, आरती, चालीसा और लाभ

गंगा सप्तमी पर्व का फोटो

Ganga worship rituals: गंगा स्नान भारतीय संस्कृति और धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गंगा नदी को पवित्र और जीवनदायिनी माना गया है, और इसका जल आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों ही दृष्टियों से शुद्धि प्रदान करता है। गंगा स्नान के साथ-साथ पूजा, आरती और गंगा चालीसा का पाठ करने से मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि होती है। यह केवल धार्मिक कृत्य नहीं है, बल्कि मानसिक शांति, समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।ALSO READ: Ganga Saptami: गंगा सप्तमी का क्या है महत्व, पूजा विधि और उपाय

 

विशेष अवसर जैसे गंगा सप्तमी, गंगा दशहरा, सावन तथा कार्तिक मास में गंगा स्नान तथा पूजन करने से पुण्य के गुण कई गुना बढ़ जाते हैं। गंगा पूजा और चालीसा का नियमित पाठ आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य लाता है।

 

आइए यहां जानते हैं गंगा स्नान और पूजा विधि, आरती, चालीसा और पूजन से होने वाले विशेष लाभ... 

 

1. गंगा स्नान की विधि

गंगा जी में स्नान करते समय कुछ नियमों का पालन करना फलदायी होता है:

 

संकल्प: स्नान से पूर्व हाथ में जल लेकर अपना नाम और गोत्र बोलकर स्नान का संकल्प लें।

 

मंत्र: स्नान करते समय इस मंत्र का उच्चारण करें:

 

"गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।

नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु।।"

 

डुबकी: गंगा में कम से कम 3 या 5 डुबकी लगानी चाहिए।

 

सावधानी: नदी स्नान के समय साबुन का प्रयोग बिलकुल भी न करें और न ही गंदगी फैलाएं।

 

2. पूजन विधि

स्नान के पश्चात गंगा किनारे पूजन करने की परंपरा है:

 

अर्घ्य: तांबे के पात्र में गंगाजल, अक्षत, फूल और रोली मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।

 

दीपदान: एक पत्तल के दोने में दीया जलाकर गंगा जी की धारा में प्रवाहित करें।

 

भोग: मां गंगा को सफेद मिठाई या बताशे अर्पित करें।

 

दान: सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों या गरीबों को अनाज, वस्त्र या धन का दान करें।ALSO READ: Ganga Saptami 2026: गंगा सप्तमी का धार्मिक महत्व, परंपरा और दान

 

3. श्री गंगा जी की आरती

 

1. श्री गंगा आरती

 

ॐ जय गंगे माता, श्री गंगे माता।

जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता।

ॐ जय गंगे माता...

 

चन्द्र-सी ज्योत तुम्हारी जल निर्मल आता।

शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता।

ॐ जय गंगे माता...

 

पुत्र सगर के तारे सब जग को ज्ञाता।

कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता।

ॐ जय गंगे माता...

 

एक ही बार भी जो नर तेरी शरणगति आता।

यम की त्रास मिटा कर, परम गति पाता।

ॐ जय गंगे माता...

 

आरती मात तुम्हारी जो जन नित्य गाता।

दास वही जो सहज में मुक्ति को पाता।

ॐ जय गंगे माता...

ॐ जय गंगे माता...।।

 

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2. गंगा मैया की आरती

 

जय गंगा मैया मां जय सुरसरी मैया।

भवबारिधि उद्धारिणी अतिहि सुदृढ़ नैया।।

 

हरी पद पदम प्रसूता विमल वारिधारा।

ब्रम्हदेव भागीरथी शुचि पुण्यगारा।।

 

शंकर जता विहारिणी हारिणी त्रय तापा।

सागर पुत्र गन तारिणी हारिणी सकल पापा।।

 

गंगा-गंगा जो जन उच्चारते मुखसों।

दूर देश में स्थित भी तुरंत तरन सुखसों।।

 

मृत की अस्थि तनिक तुव जल धारा पावै।

सो जन पावन होकर परम धाम जावे।।

 

तट-तटवासी तरुवर जल थल चरप्राणी।

पक्षी-पशु पतंग गति पावे निर्वाणी।।

 

मातु दयामयी कीजै दीनन पद दाया।

प्रभु पद पदम मिलकर हरी लीजै माया।।

 

***

 

4. श्री गंगा चालीसा

 

दोहा

जय जय जय जग पावनी जयति देवसरि गंग ।

जय शिव जटा निवासिनी अनुपम तुंग तरंग ॥

 

चौपाई

जय जग जननि अघ खानी, आनन्द करनि गंग महरानी ।

जय भागीरथि सुरसरि माता, कलिमल मूल दलनि विखयाता ।।

 

जय जय जय हनु सुता अघ अननी, भीषम की माता जग जननी ।

धवल कमल दल मम तनु साजे, लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे ।।

 

वाहन मकर विमल शुचि सोहै, अमिय कलश कर लखि मन मोहै ।

जडित रत्न कंचन आभूषण, हिय मणि हार, हरणितम दूषण ।।

 

जग पावनि त्रय ताप नसावनि, तरल तरंग तंग मन भावनि ।

जो गणपति अति पूज्य प्रधाना, तिहुं ते प्रथम गंग अस्नाना ।।

ब्रह्‌म कमण्डल वासिनी देवी श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी ।

साठि सहत्र सगर सुत तारयो, गंगा सागर तीरथ धारयो ।।

 

अगम तरंग उठयो मन भावन, लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन ।

तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट, धरयौ मातु पुनि काशी करवट ।।

 

धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी, तारणि अमित पितृ पद पीढी ।

भागीरथ तप कियो अपारा, दियो ब्रह्‌म तब सुरसरि धारा ।।

 

जब जग जननी चल्यो लहराई, शंभु जटा महं रह्‌यो समाई ।

वर्ष पर्यन्त गंग महरानी, रहीं शंभु के जटा भुलानी ।।

मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो, तब इक बूंद जटा से पायो ।

ताते मातु भई त्रय धारा, मृत्यु लोक, नभ अरु पातारा ।।

 

गई पाताल प्रभावति नामा, मन्दाकिनी गई गगन ललामा ।

मृत्यु लोक जाह्‌नवी सुहावनि, कलिमल हरणि अगम जग पावनि ।।

 

धनि मइया तव महिमा भारी, धर्म धुरि कलि कलुष कुठारी ।

मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी, धनि सुरसरित सकल भयनासिनी ।।

 

पान करत निर्मल गंगाजल, पावत मन इच्छित अनन्त फल ।

पूरब जन्म पुण्य जब जागत, तबहिं ध्यान गंगा महं लागत ।।

जई पगु सुरसरि हेतु उठावहिं, तइ जगि अश्वमेध फल पावहिं ।

महा पतित जिन काहु न तारे, तिन तारे इक नाम तिहारे ।।

 

शत योजनहू से जो ध्यावहिं, निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं ।

नाम भजत अगणित अघ नाशै, विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै ।।

 

जिमि धन मूल धर्म अरु दाना, धर्म मूल गंगाजल पाना ।

तव गुण गुणन करत सुख भाजत, गृह गृह सम्पत्ति सुमति विराजत ।।

 

गंगहिं नेम सहित निज ध्यावत, दुर्जनहूं सज्जन पद पावत ।

बुद्धिहीन विद्या बल पावै, रोगी रोग मुक्त ह्‌वै जावै ।।

गंगा गंगा जो नर कहहीं, भूखे नंगे कबहूं न रहहीं ।

निकसत की मुख गंगा माई, श्रवण दाबि यम चलहिं पराई ।।

 

महां अधिन अधमन कहं तारें, भए नर्क के बन्द किवारे ।

जो नर जपै गंग शत नामा, सकल सिद्ध पूरण ह्‌वै कामा ।।

 

सब सुख भोग परम पद पावहिं, आवागमन रहित ह्‌वै जावहिं ।

धनि मइया सुरसरि सुखदैनी, धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ।।

 

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा, सुन्दरदास गंगा कर दासा ।

जो यह पढ़ै गंगा चालीसा, मिलै भक्ति अविरल वागीसा ।।

 

दोहा

नित नव सुख सम्पत्ति लहैं, धरैं, गंग का ध्यान ।

अन्त समय सुरपुर बसै, सादर बैठि विमान ॥

सम्वत्‌ भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र ।

पूण चालीसा कियो, हरि भक्तन हित नैत्र ॥

 

।।इतिश्री गंगा चालीसा समाप्त।।

 

5. गंगा स्नान और पूजन के लाभ

शास्त्रों के अनुसार गंगा जी की महिमा अपार है:

 

पाप मुक्ति: 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' के अनुसार, गंगा का दर्शन करने और उनका नाम लेने मात्र से व्यक्ति के संचित पापों का क्षय होता है।

 

मोक्ष प्राप्ति: पितरों की शांति के लिए गंगाजल का अर्पण और तर्पण करने से उन्हें सद्गति प्राप्त होती है।

 

ग्रह दोष निवारण: विशेषकर चंद्रमा और बृहस्पति/ गुरु के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए गंगा स्नान अत्यंत लाभकारी है।

 

मानसिक शांति: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी गंगा का जल औषधीय गुणों से भरपूर है, जो तनाव कम करने और शरीर की ऊर्जा बढ़ाने में सहायक है।

 

एक विशेष सुझाव: यदि आप गंगा जी के तट पर नहीं जा सकते, तो अपने घर में स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर 'ॐ नमो गंगायै' का जाप करते हुए स्नान करें, इससे भी समान फल की प्राप्ति होती है।

 

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