
1. क्या है रोहिणी लगना:
जब सूर्य देव आकाशमंडल के 27 नक्षत्रों में से चौथे नक्षत्र 'रोहिणी' में प्रवेश करते हैं, तो उसे 'रोहिणी लगना' कहते हैं। सूर्य एक नक्षत्र में लगभग 14 दिनों तक रहता है। इसलिए रोहिणी का प्रभाव 14 दिन का होता है। यह अमूमन हर साल 25 मई के आसपास शुरू होता है।
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2. क्या होता है नौतपा:
रोहिणी नक्षत्र के शुरुआती 9 दिनों को 'नौतपा' कहा जाता है। इस दौरान गर्मी अपने चरम पर होती है। यह रोहिणी नक्षत्र के भीतर की ही एक विशेष 9 दिनों की अवधि है। यह भी 25 मई से शुरू होकर जून के शुरुआती सप्ताह तक चलता है।
सरल शब्दों में अंतर: "रोहिणी लगना" सूर्य की एक खगोलीय स्थिति (नक्षत्र प्रवेश) है, और उस स्थिति के कारण शुरू होने वाले सबसे गर्म 9 दिनों के कालखंड को "नौतपा" कहते हैं।
3. नौतपा और रोहिणी का पारंपरिक/ज्योतिषीय महत्व
भारतीय ज्योतिष के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र का स्वभाव शीतल माना गया है क्योंकि इसका स्वामी चंद्रमा है। जब ग्रहों के राजा सूर्य (जो अत्यंत गर्म हैं), चंद्रमा के इस नक्षत्र (रोहिणी) में आते हैं, तो वे इसके प्रभाव को सोख लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी पर तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। ऐसी मान्यता है कि यदि नौतपा के इन 9 दिनों में भीषण गर्मी पड़े, तो उस साल मानसून बहुत अच्छा आता है और भरपूर बारिश होती है।
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4. इसके पीछे का विज्ञान क्या है?
भले ही इसका नाम ज्योतिषीय गणना (नक्षत्र) पर आधारित हो, लेकिन नौतपा के समय पड़ने वाली इस भीषण गर्मी के पीछे पूरी तरह खगोलीय (Astronomical) और मौसम वैज्ञानिक (Meteorological) कारण हैं। इसका सीधा विज्ञान है कि जब गर्मी तेज होती तो समुद्र का जल वाष्पित होकर अधिक बादल निर्मित करेगा।
क) सूर्य की सीधी किरणें (खगोलीय कारण)
मई के उत्तरार्ध (Late May) और जून की शुरुआत में, पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere), जहाँ भारत स्थित है, सूर्य की ओर सबसे अधिक झुका होता है। इस समय सूर्य की किरणें कर्क रेखा (Tropic of Cancer) के ठीक ऊपर यानी भारत के मध्य भाग पर बिल्कुल सीधी (90 डिग्री पर) पड़ती हैं। सीधी किरणों के कारण वायुमंडल सबसे ज्यादा गर्म हो जाता है।
ख) 'लो प्रेशर एरिया' या कम दबाव का क्षेत्र (मौसम विज्ञान)
विज्ञान के नियम के अनुसार, जब किसी स्थान पर अत्यधिक गर्मी पड़ती है, तो वहाँ की हवा गर्म होकर हल्की हो जाती है और ऊपर उठ जाती है। इससे ज़मीन के पास 'कम हवा के दबाव का क्षेत्र' (Low Pressure Area) बन जाता है।
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ग) मानसून से सीधा संबंध
भारत के मैदानी इलाकों (जैसे उत्तर और मध्य भारत) में नौतपा के दौरान जब भीषण गर्मी से मजबूत 'लो प्रेशर एरिया' बनता है, तो प्रकृति इसे संतुलित करने का प्रयास करती है। इस खाली जगह को भरने के लिए समुद्र (हिंद महासागर और अरब सागर) की तरफ से ठंडी और नमी से भरी हवाएं (High Pressure) तेज़ी से धरती की ओर खिंची चली आती हैं।
इन्हीं नमी युक्त हवाओं को हम 'मानसून' कहते हैं। इसलिए विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि मई के अंत में उत्तर भारत जितनी तीव्रता से तपेगा, समुद्र से मानसूनी हवाएं उतनी ही तेजी से आगे बढ़ेंगी, जिससे बारिश अच्छी होगी।
निष्कर्ष
'रोहिणी' और 'नौतपा' हमारे पूर्वजों द्वारा मौसम के चक्र को समझने का एक अनूठा व्यावहारिक तरीका था। जिसे वे नक्षत्रों के आधार पर देखते थे, आज का आधुनिक विज्ञान उसे 'सोलर इंसोलेशन' (Solar Radiation) और 'वायुमंडलीय दबाव' (Atmospheric Pressure) के रूप में प्रमाणित करता है।
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