Guru Pradosh Vrat 2026: गुरु प्रदोष का व्रत रखने का महत्व और विधि

चित्र में प्रदोष व्रत पर जलते हुए दीये के साथ प्रदोष काल में भगवान शिव के पूजन का फोटो

How to observe Pradosh Vrat: गुरु प्रदोष व्रत भगवान शिव और बृहस्पति (गुरु देव) की संयुक्त पूजा के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में धन, सुख, संतान, वैभव, बुद्धि और वैभव की वृद्धि होती है। इस दिन विशेष रूप से शिवलिंग का पूजन, गुरु मंत्र का जप, और सात्विक भोजन का सेवन या निर्जल उपवास करने की परंपरा है। इस व्रत के दौरान व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्मों को शुद्ध करता है, जिससे उसके जीवन में मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक प्रगति होती है।ALSO READ: Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री व्रत: आस्था, तर्क और आधुनिकता का संगम, क्या बदल रहे हैं रिश्तों के मायने?

 

यहां गुरु प्रदोष व्रत का महत्व और संपूर्ण विधि दी गई है:

 

गुरु प्रदोष व्रत का महत्व

गुरु प्रदोष का मुख्य संबंध शत्रु नाश, विजय और सुख-सौभाग्य से है।

 

शत्रुओं पर विजय: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

 

बृहस्पति ग्रह की मजबूती: जिनका गुरु कमजोर हो, उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिए। इससे मान-सम्मान और विद्या में वृद्धि होती है।

 

संतान सुख: धार्मिक दृष्टिकोण से यह व्रत संतान प्राप्ति और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए भी फलदायी माना गया है।

 

मोक्ष की प्राप्ति: प्रदोष काल में शिव जी की पूजा करने से जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश होता है।

 

व्रत और पूजा की विधि

प्रदोष व्रत में 'प्रदोष काल' (सूर्यास्त के समय) की पूजा का सबसे अधिक महत्व होता है।

 

1. प्रातः काल की तैयारी

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र तथा संभव हो तो पीले वस्त्र धारण करें।

 

हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें: 'हे महादेव, आज मैं आपके निमित्त गुरु प्रदोष व्रत रख रहा/रही हूँ, इसे स्वीकार करें।'

 

पूरे दिन निराहार रहें या केवल फलाहार करें।

 

2. प्रदोष काल पूजा (मुख्य समय)

तिथि: 14 मई 2026, गुरुवार

ज्येष्ठ, कृष्ण त्रयोदशी पर प्रदोष काल (पूजा समय): 07:04 पीएम से 09:09 पीएम सूर्यास्त के बाद का यह समय पूजा के लिए सर्वोत्तम है। 

अवधि- 02 घण्टे 05 मिनट्स

सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और 45 मिनट बाद का समय प्रदोष काल कहलाता है।

 

शुद्धिकरण: शाम को पुनः स्नान करें और मंदिर की सफाई करें।

 

अभिषेक: शिवलिंग का गंगाजल, गाय के दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें।

 

श्रृंगार: शिव जी को चंदन, बेलपत्र, धतूरा, मदार के फूल और अक्षत यानी बिना टूटे चावल अर्पित करें।

 

भोग: गुरु प्रदोष होने के कारण भगवान शिव को पीले रंग की मिठाई या बेसन के लड्डू का भोग लगाना शुभ होता है।

 

कथा व मंत्र: गुरु प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें। साथ ही महामृत्युंजय मंत्र या 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करें।

 

3. आरती और पारण

अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें।

 

पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करें। अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण अर्थात् व्रत खोलें।

 

गुरु प्रदोष के लिए विशेष उपाय

पीले फूल: शिव जी को पीले कनेर के फूल चढ़ाने से धन-धान्य की वृद्धि होती है।

 

दान: इस दिन चने की दाल या गुड़ का दान करना बहुत फलदायी माना जाता है।

 

दीपदान: शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे और मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश नहीं करती।

 

महत्वपूर्ण टिप: प्रदोष व्रत में कभी भी पूजा के दौरान तुलसी दल या केतकी के फूल का प्रयोग न करें, क्योंकि शिव पूजा में इनका निषेध है।

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